Rao Chandrasen - The Forgotten Hero of Marwar | Rao Chandrasen in Hindi

राजस्थान | भारत का एक ऐसा राज्य जो प्राचीन काल से ही वीर योद्धाओ की जन्मभूमि रही है फिर चाहे मुग़ल हो या अंग्रेज इन्होने डटकर इनका सामना किया और मातृभूमि की रक्षा में अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए|


दोस्तों महाराणा प्रताप को हम सभी जानते है इनके बारे में हर जगह पढ़ने भी मिल जाता है लेकिन आज हम जिस योद्धा के बारे में आपको  बताने जा रहे है इन्होने भी महाराणा प्रताप की तरह कभी मुगलो की अधीनता स्वीकार नहीं की | और अपनी आखिरी साँस तक मुगलो का  सामना करते रहे|

लेकिन बड़े दुख की बात हे की इस मारवाड़ के योद्धा को इतिहास के पन्नो में वो जगह नहीं मिलीं जिसके ये हक़दार थे| इसलिए इनको  "मारवाड़ का भूला हुआ नायक" (The forgotten Hero of Marwar) भी कहते है

आईये इनके बारे में विस्तार से जानते है :-


Rao Chandrasen Rathore


Rao Chandrasen Rathore का जन्म विक्रम संवत 1598 (30 जुलाई, 1541 ई.) को मारवाड़ (वर्तमान में जोधपुर) में हुआ था| राव चंद्रसेन जोधपुर के वीर और शक्तिशाली राजा राव मालदेव के सबसे छोटे पुत्र थे| राव चंद्रसेन अपने पिता की तरह एक महान सेनानी थे चंद्रसेन मुगल काल में मारवाड़ के सबसे वीर और साहसी योद्धा थे |

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Rao Chandrasen Rathore

इन्हीं कारणों से मालदेव ने राव चंद्रसेन को छोटे होने के बावजूद भी मारवाड़ का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया| 1562 ई. पुरे राजशाही तरीके से राव चन्द्रसेन का राज्याभिषेक किया गया, 

Rao Chandrasen History in Hindi


Rao Chandra sen के मारवाड़ की गद्दी पर बैठते उनके बड़े भाई राम सिंह और उदय सिंह दोनों ने राजगद्दी की लालसा में विद्रोह शुरू कर दिया| अब मारवाड़ में गृह युद्ध का खतरा मंडरा रहा था राव चंद्रसेन ने अपने भाइयों के विद्रोह को दबाने में सक्षम रहे लेकिन अपने भाइयो के दिलो में अपने लिए पैदा हुई नफरत को मिटने रहे| चन्द्रसेन के दोनों भाई चन्द्रसेन से बदला लेने की नियत से उनके विरोधी अकबर के दरबार पहुंचे और मुगलो के साथ गठबंधन कर लिया| 

मुग़ल बादशाह अकबर की नीति हमेसा से यही रही की अगर राजपूतो से युद्ध में जितना हे तो उनमे आपस में फुट डलवा दो | अकबर ने चंद्रसेन और उनके भाइयों की फूट का लाभ लेने के लिए अपनी सेना को मारवाड़ पर आक्रमण करने  के लिए भेज दिया| जिसमें चंद्रसेन के भाई भी शामिल थे। अपने भाइयो के विरोधी सेना में शामिल होने और उन्हें किले के सारे राज बताने से चंद्रसेन युद्ध में हार गए और उनको मारवाड़  का किला खाली करके भाद्राजून चला जाना पड़ा।

मारवाड़ से चले जाने के बाद साधन हीन चंद्रसेन की आर्थिक स्थिति निरंतर बिगड़ती जा रही थी | परिस्थितियों के अनुकूल चंद्रसेन ने यह उचित समझा कि अकबर के साथ सन्धि कर ली जाये ।सन् 1570 ई0 को जब बादशाह अकबर जियारत करने अजमेर से आया और वहां से वह नागौर पहुंचा, जहाँ पर सभी राजपूत राजाओ को उससे मिलने के लिए वहा बुलावा भेजा था।

 राव चन्द्रसेन भी नागौर पहुंचे| पर वह अकबर की फूट डालो नीति देखकर वापस लौट आया। जहा पर चन्द्रसेन ने अकबर के पैगाम ठुकराते हुई कहा था  मुझे बिना राजगद्दी के रहना मंजूर हे लेकिन मुगलो की गुलामी में राजगद्दी पर नहीं बेठुंगा|

उस वक्त उसका सहोदर उदयसिंह भी वहां उपस्थित था, जिसे अकबर ने जोधपुर के शासक के तौर पर मान्यता दे दी। कुछ समय पश्चात मुग़ल सेना ने भाद्राजूण पर आक्रमण कर दिया, पर राव चन्द्रसेन वहां से सिवाना के लिए निकल गए। सिवाना में चन्द्रसेन ने अपने कुछ साथियो के साथ अकबर के विरुद्ध युद्ध की रणनीति बनानी  चालू की| 

Rao Chandrasen ji ने दुर्ग में रहकर रक्षात्मक युद्ध करने के बजाय पहाड़ों में जाकर छापामार युद्ध प्रणाली अपनाई। सिवाना से ही राव चन्द्रसेन ने मुग़ल क्षेत्रों, जैतारण, जोधपुर अजमेर, आदि पर छापामार हमले शुरू कर दिए। अपने कुछ भरोसेमंद सेनिको को क़िले में छोड़कर खुद पिपलोद के पहाड़ों में चले गए और वहीं से मुग़ल सेना पर आक्रमण करते और उनकी रसद सामग्री आदि को लूट लेते। बादशाह अकबर ने उनके विरुद्ध कई बार बड़ी सेनाएं भेजीं, पर अपनी छापामार युद्ध नीति के बल पर राव चन्द्रसेन अपने थोड़े से सैनिको के दम पर ही मुग़ल सेना पर भारी रहे।

अकबर की सेना और चन्द्रसेन के बिच 2 वर्ष तक ऐसे ही युद्ध चलता रहा और परन्तु चन्द्रसेन और उनके राठौड़ सेनिको ने मुग़ल सेना का मुँह तोर जवाब दिया | जनवरी 1575 ई0 में अकबर को आगरा से और एक बड़ी सेना भेजनी पडी। लेकिन इस बार फिर मुगलों को असफलता का सामना पड़ा |  जिससे अबकी बार अकबर बहुत नाराज हुआ। इसके बाद उसने जलाल खान के नेतृत्व में सेना भेजी परन्तु जलाल खान स्वयं चन्द्रसेन के हाथो मारा गया।

अब अकबर बहुत ही घबरा गया था अकबर की इतनी विशाल सेना चन्द्रसेन की एक छोटी सी सेना के सामने नहीं टिक पा रही थी| चौथी बार बादशाह अकबर ने और भी बड़ी सेना शाहबाज खां के नेतृत्व में भेजी| और 1576 ई0 में आख़िरकार सिवाना दुर्ग पर मुगलो ने अधिकार कर लिया ।

सिवाना पर मुग़ल सेना के आधिपत्य के बाद राव चन्द्रसेन मेवाड़, सिरोही, डूंगरपुर और बांसवाड़ा आदि स्थानों पर रहने लगे| परन्तु मुग़ल सेना उनका बराबर पीछा करती रही | उसके बाद सन् 1579ई0 में चंद्रसेन ने अजमेर के पहाड़ों से निकल कर सोजत के पास सरवाड़ के थाने से मुगलों को भगाया और स्वयं सारण पर्वत क्षेत्र में रहने लगे। उसी क्षेत्र में 1581 में सिंचियाई (सारन की पहाड़िया) (पाली) चंद्रसेन की मृत्यु हो गयी। राव चन्द्रसेन की मृत्यु के बाद मोटा राजा उदयसिंह शासक बना|

Rao Chandrasen Rathore अकबर के खिलाफ 19 साल तक युद्ध करते रहे लेकिन उसकी अधीनता कभी स्वीकार नहीं की ,मुग़ल शासक अकबर ने बहुत कोशिश की कि राव चन्द्रसेन उसकी अधीनता स्वीकार कर ले, पर साहसी और वीर राव चन्द्रसेन अकबर के मुकाबले कम साधन होने के बावजूद अपने जीवन में अकबर के आगे झुके नहीं और अपने मरते दम तक मुगलो के खिलाफ विद्रोह जारी रखा। 

महाराणा प्रताप और राव चन्द्रसेन दोनों हिंदुस्तान वो महान राजा थे जिन्होंने अकबर को दातो तले अंगुली चबवाइ थी और अपने स्वाभिमान को जिन्दा रखते हूए कभी मुगलो की कभी गुलामी स्वीकार नहीं की |

धन्य  है वो माँ जिसने ऐसे वीर योद्धाओ को पैदा किया और धन्य है वो धरती जहा ऐसे वीर पैदा हुऐ | एक राजपूत हिन्दू होने के नाते आज भी हमें अपने पूर्वजो गर्व महसूस होता है  जिन्होंने अपने धर्म और स्वाभिमान के खातिर अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए| 



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