Rao Maldev Rathore In Hindi || राव मालदेव :- मारवाड़ का सबसे शक्तिशाली राजा ||

हेलो दोस्तों जैसा की हम सब जानते है की भारत एक ऐतिहासिक और वीर योद्धाओ की जन्मभूमि वाला देश रहा है  इस देश में ऐसे बहुत से वीर पैदा हुए है जिन्होंने अपने धर्म और मातृभूमि के लिए अपने प्राण तक न्यौछावर कर दिए| और कभी मुगलो की अधिनता स्वीकार नहीं की |



Rao Maldev Rathore 


आज हम आपको मारवाड़ के इतिहास (History of marwar) में से एक ऐसे ही एक वीर और प्रतापी योद्धा के बारे में बताने जा रहे है जिसने मुगलो को पराजय का स्वाद चकाया | हम बात कर रहे कर रहे हे मारवाड़ (जोधपुर) के प्रतापी शासक Rao Maldev Rathore के बारे में. 

जिसने दिल्ली सल्तनत को हिला के रख दिया था| और दिल्ली सल्तनत के शासक शेरशाह सूरी को युद्ध के मैदान में कड़ी टक्कर दी| इस युद्ध के बाद शेरशाह ने कहा था - मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिंदुस्तान की बादशाहत खो देता|


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Rao Maldev Rathore


परिचय :- 

 Maldev Rathore मारवाड़ (जोधपुर) रियासत के राजा थे | उनके पिता का नाम राव गंगा था| उनका जनम 4 सितंबर 1511 हुआ| पिता की मृत्यु के पश्चात् वि॰सं॰ १५८८(१५३१ ई.) में सोजत में मारवाड़ की गद्दी पर बैठे।

उस समय इनका शासन केवल सोजत और जोधपुर के परगनों पर ही था। जैतारण, पोकरण, फलौदी, बाड़मेर, कोटड़ा, खेड़, महेवा, सिवाणा, मेड़ता आदि के सरदार आवश्कतानुसार जोधपुर नरेश को केवल सैनिक सहायता दिया करते थे। परन्तु अन्य सब प्रकार से वे अपने-अपने अधिकृत प्रदेशों के स्वतन्त्र शासक थे।

मारवाड़ के इतिहास में Rao Maldev का राज्यकाल मारवाड़ का "शौर्य युग" कहलाता है। राव मालदेव अपने युग का महान् योद्धा, महान् विजेता और विशाल साम्राज्य का स्वामी था। उसने अपने बाहुबल से एक विशाल साम्राज्य स्थापित किया था। 

मालदेव ने सिवाणा जैतमालोत राठौड़ों से, चौहटन, पारकर और खाबड़ परमारों से, रायपुर और भाद्राजूण सीधलों से, जालौर बिहारी पठानों से, मालानी महेचों से, मेड़ता वीरमदेव से, नागौर, सांभर, डीडवाना मुसलमानों से, अजमेर साँचोर चौहाणों से छीन कर जोधपुर (मारवाड़) राज्य में मिलाया। 


इस प्रकार Maldev ने वि॰सं॰ 1600 तक अपने साम्राज्य का अत्यधिक विस्तार कर लिया। उत्तर में बीकानेर व हिसार, पूर्व में बयाना व धौलपुर तक एवं दक्षिण-पश्चिम में राघनपुर व खाबड़ तक उसकी राज्य सीमा पहुँच गई थी। 

पश्चिम में भाटियों के प्रदेश (जैसलमेर) को उसकी सीमाएँ छू रही थी। इतना विशाल साम्राज्य न तो राव मालदेव से पूर्व और न ही उसके बाद ही किसी राजपूत शासक ने स्थापित किया।


राव मालदेव वीर थे लेकिन वे जिद्दी भी थे। ज्यादातर क्षेत्र इन्होंने अपने ही सामन्तों से छीना था। वि॰सं॰ 1591 (ई.स. 1535) में मेड़ता पर आक्रमण किया  उस समय अजमेर पर राव वीरमदेव का अधिकार था और इस युद्ध में मालदेव की जीत हुई और मेड़ता राव वीरमदेव से छीन लिया।  वहाँ भी राव मालदेव ने अधिकार कर लिया। 

वीरमदेव इधर-उधर भटकने के बाद दिल्ली शेरशाह सूरी के पास चला गया। उसके बाद सन 1542 में राव मालदेव ने बीकानेर पर हमला किया। बीकानेर राव जैतसी साहेबा (पाहोबा) के युद्ध में हार गए और वीरगति को प्राप्त हो गये ।


बीकानेर पर मालदेव का अधिकार हो गया। बीकानेर का प्रबंधन सेनापति कूंम्पा को सोंप दिया। बदले की भावना लेकर राव जैतसी का पुत्र कल्याणमल और भीम भी दिल्ली शेरशाह के पास चले गए। राव वीरमदेव और भीम दोनों मिलकर शेरशाह को मालदेव के विरुद्ध कार्रवाई करने की प्राथना  की।



फारसी इतिहास लेखकों ने राव मालदेव को “हिन्दुस्तान का हशमत वाला राजा" कहा है।


विवाह :-



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रानी उमादे

राव मालदेव का विवाह 1536 ई. में जैसलमेर के राव लूणकरण की पुत्री रानी उमादे के साथ हुआ, विवाह के कुछ समय पछात राव मालदेव व उमादे में अनबन हो गयी | उसके बाद रानी ने अपना सम्पूर्ण समय तारागढ़ दुर्ग में व्यतीत कर दिया था। इस कारण राजस्थान के इतिहास में रानी उमादे को रूठी रानी के नाम से भी जाना जाता है|

गिरी-सुमेल युद्ध :- Giri-Sumel War


गिरी-सुमेल युद्ध राव मालदेव एवं शेरशाह सूरी के मध्य 5 जनवरी 1544 ई. में हुआ था| राव मालदेव की बढ़ती हुई शक्ति से शेरशाह काफी चिंतित था। इसीलिए उसने बीकानेर नरेश कल्याणमल एवं मेड़ता के शासक वीरमदेव के आमन्त्रण पर राव मालदेव के विरुद्ध सैन्य अभियान छेड़ दिया।

 अपने स्वजातीय बन्धुओं के राज्य छीन कर राव मालदेव ने अपने पतन के बीज बोये। मालदेव महान् विजेता था परन्तु उसमें कूटनीतिक छल-बल और ऐतिहासिक दूर दृष्टि का अभाव था। शेरशाह में कूटनीतिक छल-बल और सामरिक कौशल अधिक था। 

शेरशाह के आने की खबर पाकर मारवाड़ का शासक राव मालदेव राठौड़ भी अपनी 50 हजार घुड़सवार सेना के साथ गिरी-सुमेल पहुंच गया. एक महीने तक दोनों सेनाएं डेरा डालकर बैठी रहीं. एक महीने बाद शेरशाह को परेशानी पैदा होने लगी.

 इतनी बड़ी सेना को खिलाने के लिए राशन जुटा पाना बहुत मुश्किल हो गया. ये जगह दिल्ली से बहुत दूर थी. राशन की सप्लाई लाइन ठीक से खड़ी नहीं हो पा रही थी. शेरशाह ने आखिरी चाल चली.

शेरशाह ने अपने नाम से एक खत लिखा. इस खत में उसने मालदेव के कुछ सरदारों को वफ़ादारी बदलने के लिए शुक्रिया अदा किया था. शेरशाह ने ये खत मालदेव के डेरे के पास फिंकवा दिया ताकि ये उसके हाथ लग जाए. शेरशाह की चाल कामयाब रही. मालदेव भितरघात की अफवाह से परेशान हो गया. इससे राव मालदेव को अपने ही सरदारों पर सन्देह हो गया।

यद्यपि सरदारों ने हर तरह से अपने स्वामी की शंका का समाधान कूरने की चेष्टा की, फिर भी उनका संदेह दूर नहीं हो सका और वह रात्रि में ही अपने शिविर से प्रमुख सेना लेकर वापस लौट गया। मारवाड़ की सेना बिखर गई। ऐसी स्थिति में मगरे के नरा चौहान अपने नेतृत्व में 3000 राजपूत सैनिको को लेकर युद्ध के लिए आगे आये। 

कहते हैं कि युद्ध क्षेत्र से पीछे हटने के फैसले के बाद मालदेव के दो सेनापति जेता और कुम्पा पास ही के कुएं से पानी पीने गए. इस समय वहां पर दो महिलाएं भी पानी लेने आई हुई थीं. इसमें से एक महिला ने चिंता जताते हुए दूसरी से कहा कि अफगान सैनिक बहुत खूंखार हैं. अगर वो आ गए तो हमारा क्या होगा? जवाब में दूसरी महिला ने कहा कि जब तक जेता और कुम्पा मौजूद हैं तब तक डरने की कोई बात नहीं|

जेता और कुम्पा मारवाड़ के आसोप ठिकाने के सरदार थे. कुम्पा रिश्ते में जेता का चाचा लगता था. दोनों लोग मालदेव की सेना में सेनापति थे. इन्होंने अजमेर के शासक विरमदेव को हराकर अजमेर, मेड़ता और डीडवाना के इलाके पर मारवाड़ का पंचरंगी झंडा लहराया था. 

महिला की बात सुनने के बाद जेता और कुम्पा मालदेव के डेरे में गए. उन्होंने मालदेव से कहा कि वो गिरी-सुमेल छोड़कर नहीं जाना चाहते. समझाइश के बाद मालदेव दस हजार घुड़सवारों की सेना को जेता और कुम्पा के नेतृत्व में पीछे छोड़कर जोधपुर चले गए.

4 जनवरी 1544 के रोज मालदेव के जोधपुर चले जाने के बाद कुम्पा और जेता ने शेरशाह की सेना पर हमला कर दिया. शेरशाह को उम्मीद थी कि उसकी 80,000 की घुड़सवार सेना कुछ ही घंटों में 10,000 राजपूतों को पीटकर रख देगी. लेकिन कुछ भी वैसा नहीं हुआ, जैसा शेरशाह ने सोचा था. कुम्पा और जेता के नेतृत्व में राजपूतों ने मुकाबले की शक्ल बदल कर रख दी. कुछ ही घंटों में बादशाह की आधी सेना ढेर हो गयी|

हालत यहां तक पहुंच गई कि शेरशाह ने मैदान छोड़ने की तैयारी कर ली. उसने वापिस दिल्ली लौटने के लिए अपने घोड़े पर जीन कसने के निर्देश भी दे दिए. इस बीच उसके सेनापति खवास खान ने आकर खबर दी कि कुम्पा और जेता मारे गए हैं और उसकी सेना ने भयंकर नुकसान झेलकर आखिरकार ये जंग जीत ली है.

तब जाकर कहीं शेरशाह ने राहत की सांस ली. इस युद्ध में राठौड़ जैता, कूम्पा पंचायण करमसोत, सोनगरा अखैराज, नरा चौहान आदि मारवाड़ के प्रमुख वीर इतनी वीरता से लड़ें की शेरशाह सूरी को बहुत मुश्किल से ही विजय प्राप्त हुई थी। तब शेरशाह ने कहा था कि “खुदा का शुक्र है कि किसी तरह फतेह हासिल हो गई, वरना मैंने एक मुट्टी भर बाजरे के लिए हिन्दुस्तान की बादशाहत ही खो दी होती।"
इन वीर योद्धाओ का इतिहास आज केवल किताबो में एक कहानी बनकर रह गया है | हमेसा से हम सबको किताबो में अकबर महान यही सब पढ़ाया गया है लेकिन इन वीर जैपा और कुम्पा के बारे में किताबो में कही नई लिखा गया है | हमें अपने आने वाली पीढ़ी को इन वीरो के इतिहास के बारे में जरूर बताना होगा ताकि उनको भी ये मालूम रहे की हमारे भारत की धरती वीर योद्धाओ की धरती है 

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1 Comments

  1. bahut hi achi jankari likhi h apne itihas ke bare me.

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