The Untold History of Marwar Rajasthan.

History of Marwar in Hindi

मारवाड़ (जिसे जोधपुर क्षेत्र भी कहा जाता है) उत्तर पश्चिमी भारत में दक्षिण-पश्चिमी राजस्थान राज्य का एक क्षेत्र है। यह थार रेगिस्तान में आंशिक रूप से स्थित है। मरु शब्द संस्कृत का रेगिस्तान है। राजस्थानी बोली में, "वाड" का अर्थ एक विशेष क्षेत्र है। मारवाड़ शब्द का अंग्रेजी अनुवाद 'रेगिस्तान का क्षेत्र' है।

इस क्षेत्र में बाड़मेर, जालौर, जोधपुर, नागौर, पाली और सीकर के कुछ हिस्सों के वर्तमान जिले शामिल है।



मारवाड़ के प्रमुख राजवंश



गुर्जर – प्रतिहार वंश:

प्रतिहार वंश की स्थापना नागभट्ट नामक एक सामन्त ने 725 ई. में की थी। उसने राम के भाई लक्ष्मण को अपना पूर्वज बताते हुए अपने वंश को सूर्यवंश की शाखा सिद्ध किया। प्रतिहार सूर्यवंश का होना सिद्द करते है तथा प्रतिहारो के शिलालेखो पर अंकित सूर्यदेव की कलाकृर्तिया भी इनके सूर्यवंशी होने की पुष्टि करती है। 


इतिहासकार बताते है कि मुग़ल काल से पहले तक राजस्थान तथा गुजरात, गुर्जरत्रा या गुर्जर-भूमि के नाम से जाना जाता था। अरब लेखकों के अनुसार प्रतिहार उनके सबसे भयंकर शत्रु थे तथा उन्होंने ये भी कहा है कि अगर प्रतिहार नहीं होते तो वो भारत पर 12वीं सदी से पहले ही अधिकार कर लेते, इस वंश के आगे गुर्जर शब्द का भी प्रयोग किया जाता है जो कि जाति सूचक ना होकर देश सूचक है|

प्रतिहार द्वारा गुर्जरत्रा क्षेत्र पर शासन करने के कारण उनको गुर्जर प्रतिहार भी कहा जाता है प्रतिहार वंश एक सूर्यवंशी क्षत्रीय राजपूत वंश है, तथा इतिहासकार ही इसे राजपूत वंश ही बताते है तथा सरकारी अभिलेखों मे भी इसे राजपूत राजवंश ही माना जाता है|

ग्वालियर प्रशस्ति अभिलेख से इस वंश के बारे में कई महत्वपूर्ण बाते ज्ञात होती है। नागभट्ट प्रथम (७३०-७५६ ई॰) को इस राजवंश का पहला राजा माना गया है। आठवीं शताब्दी में भारत में अरबों का आक्रमण शुरू हो चुका था। सिन्ध और मुल्तान पर उनका अधिकार हो चुका था। 

फिर सिंध के राज्यपाल जुनैद के नेतृत्व में सेना आगे मालवा, जुर्ज और अवंती पर हमले के लिये बढ़ी, जहां जुर्ज पर उसका कब्जा हो गया। परन्तु आगे अवंती पर नागभट्ट ने उन्हैं खदैड़ दिया। अजेय अरबों कि सेना को हराने से नागभट्ट का यश चारो ओर फैल गया।


The Untold History of Marwar Rajasthan.

अरबों को खदेड़ने के बाद नागभट्ट वहीं न रुकते हुए आगे बढ़ते गये। और उन्होंने अपना नियंत्रण पूर्व और दक्षिण में मंडोर, ग्वालियर, मालवा और गुजरात में भरूच के बंदरगाह तक फैला दिया। उन्होंने मालवा में अवंती (उज्जैन) में अपनी राजधानी की स्थापना की, और अरबों के विस्तार को रोके रखा, जो सिंध में स्वयं को स्थापित कर चुके थे। मुस्लिम अरबों से हुए इस युद्ध (७३८ ई॰) में नागभट्ट ने प्रतिहारों का एक संघीय का नेतृत्व किया।

 नागभट्ट के बाद दो कमजोर उत्तराधिकारी आये, उनके बाद आये वत्सराज (७७५-८०५ई॰) ने साम्राज्य का और विस्तार किया। आठवीं से दसवीं सी तक राजस्थान के गुर्जर-प्रतिहारों की तुलना में कोई प्रभावी  राजपुत वंष नही था। इनका आधिपत्य न केवल राजस्थान के पर्याप्त भू-भाग पर था बल्कि सुदूर ‘कन्नौज‘ नगर पर अधिकार हेतु 100 वर्षो तक गुर्जर प्रतिहारों, बंगाल के पालों एंव दक्षिण राष्ट्र कूटों के मध्यय अनवरत संघर्ष (त्रिपक्षीय संघर्ष) चलता रहा जिसमें अंततः विजयश्री गुर्जर प्रतिहारों को ही मिली है।


राजस्थान में गुर्जर-प्रतिहार की दो शाखाओं का अस्तित्व था-
1.मंडोर शाखा   2.भीनमाल (जालौर) शाखा


 पतन 


महेन्द्रपाल की मृत्यु के बाद उत्तराधिकारी का युद्ध हुआ, और राष्ट्रकुटों कि मदद से महिपाल का सौतेला भाई भोज द्वितीय (910-912) कन्नौज पर अधिकार कर लिया हलांकि यह अल्पकाल के लिये था, राष्ट्रकुटों के जाते ही महिपाल प्रथम (९१२-९४४ ई॰) ने भोज द्वितीय के शासन को उखाड़ फेंका।

प्रतिहारों की अस्थायी कमजोरी का फायदा उठा, साम्राज्य के कई सामंतवादियों विशेषकरक मालवा के परमार, बुंदेलखंड के चन्देल, महाकोशल का कलचुरि, हरियाणा के तोमर और चौहान स्वतंत्र होने लगे। 
राष्ट्रकूट वंश के दक्षिणी भारतीय सम्राट इंद्र तृतीय (९९९-९२८ ई॰) ने ९१२ ई० में कन्नौज पर कब्जा कर लिया। 

यद्यपि प्रतिहारों ने शहर को पुनः प्राप्त कर लिया था, लेकिन उनकी स्थिति 10वीं सदी में कमजोर ही रही, पश्चिम से तुर्को के हमलों, दक्षिण से राष्ट्रकूट वंश के हमलें और पूर्व में पाल साम्राज्य की प्रगति इनके मुख्य कारण थे।


प्रतिहार राजस्थान का नियंत्रण अपने सामंतों के हाथ खो दिया और चंदेलो ने ९५० ई॰ के आसपास मध्य भारत के ग्वालियर के सामरिक किले पर कब्जा कर लिया। १०वीं शताब्दी के अंत तक, प्रतिहार कन्नौज पर केन्द्रित एक छोटे से राज्य में सिमट कर रह गया। कन्नौज के अंतिम प्रतिहार शासक यशपाल के १०३६ ई. में निधन के साथ ही इस साम्राज्य का अन्त हो गया।
   

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